पहले के जैसे तुझमें वो अब बात नहीं है।
हमसे न मिली थी कभी तू साथ नहीं है।
चाहा था तुझे चाहतें दिल में ही रह गईं,
तुम हो अमीर पाने की औकात नहीं है।
अरुण द्विवेदी "अनन्त''
अयोध्या 9918140485
शनिवार, 17 अगस्त 2019
मुक्तक
गुरुवार, 15 अगस्त 2019
दीपक
दीपक जलाकर अंधेरा मिटाओ।
गिरे राह में दीन जन को उठाओ।।
मिटाकर घृणा अपने दिल से चलो तुम।
बनकर प्रखर ज्योति जग में जलो तुम।।
करो स्नेह सबसे ये दिन न गंवाओ।
दीपक जलाकर......................1।।
जीवन मिला व्यर्थ करिए न इसको।
खिला फूल जो नष्ट करिए न इसको।।
तजो द्वेष सबको गले से लगाओ।
दीपक जलाकर....................2।।
किसी आदमी को न छोटा जताओ।
किसी भी पथिक को कभी न सताओ।।
बढ़ो खुद और सबको आगे बढ़ाओ।
दीपक जलाकर.....................3।।
कवि अरुण द्विवेदी "अनन्त (अयोध्या)
9918140485
मां
सभी सुख मां के चरणों में मैं जब भी सर को रखता हूं।
सभी तीरथ ही माता हैं बसा के दिल में चलता हूं।
कोई कहता भले ही हो कि मैं मां के बिना रह लूं,
मगर माता को ही मैं तो अनंतीश्वर समझता हूं।
सभी तीरथ ही माता हैं बसा के दिल में चलता हूं।
कोई कहता भले ही हो कि मैं मां के बिना रह लूं,
मगर माता को ही मैं तो अनंतीश्वर समझता हूं।
कवि अनन्त
श्री अयोध्या धाम
श्री अयोध्या धाम
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