बुधवार, 9 दिसंबर 2020

भ्रष्ट है जब नियति राजनीती कहूं।हैं धरा पे धरे आपबीती कहूं।भूख से जब तड़फ हद से ज्यादा हुई,ज्ञान गंगा लिए धर्मनीती कहूं।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम

भ्रष्ट  है जब  नियति  राजनीती कहूं।
हैं   धरा   पे    धरे   आपबीती   कहूं।
भूख से जब तड़फ हद से ज्यादा हुई,
ज्ञान    गंगा    लिए   धर्मनीती   कहूं।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम

गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

दर पे तेरे सर को झुकाने आ गया।आपसे ही मिलने के बहाने आ गया।सम्मान ये मिला है जो आपका मुझे,प्रेम की गंगा में मैं नहाने आ गया।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

दर पे तेरे  सर  को  झुकाने आ गया।
आपसे ही मिलने के बहाने आ गया।
सम्मान ये मिला है जो आपका मुझे,
प्रेम की गंगा  में  मैं  नहाने आ गया।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
      श्री अयोध्या धाम
      9918140485

धर्म पथ पर बढूं मां यही प्रार्थना।सत्य सीढ़ी चढूं मां यही प्रार्थना।नित्य करता रहूं मां चरण वंदना,स्वप्न सुंदर गढूं मां यही प्रार्थना।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

धर्म पथ पर बढूं मां यही प्रार्थना।
सत्य  सीढ़ी चढूं मां यही प्रार्थना।
नित्य करता  रहूं  मां चरण वंदना,
स्वप्न सुंदर  गढूं मां  यही प्रार्थना।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
       9918140485

मरें हम भूख से लेकिन उन्हें करना बहाना है।नहीं है जेब में पैसे नहीं कोई ठिकाना है।ज्ञान गंगा बहा जाओ नियम पालन करूं कैसे,छोड़ कर ए शहर तुझको हमें भी गांव जाना है।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

मरें हम भूख से  लेकिन  उन्हें करना बहाना है।
नहीं  है  जेब  में   पैसे   नहीं  कोई  ठिकाना है।
ज्ञान गंगा बहा  जाओ  नियम पालन करूं कैसे,
छोड़ कर ए शहर तुझको हमें भी गांव जाना है।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
       9918140485

सोमवार, 27 जुलाई 2020

गरीबी में पला हूं मैं गरीबी में ही जीता हूं।गरीबी सा नहीं सुख है मैं गम को रोज सीता हूं।मेरी रब से है ये विनती जन्म लूं मैं गरीबी में,अमीरी से न नाता है गरीबी में ही पीता हूं।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

गरीबी  में  पला  हूं  मैं  गरीबी  में  ही  जीता हूं।
गरीबी सा नहीं सुख है मैं गम को रोज सीता हूं।
मेरी  रब  से है  ये विनती  जन्म लूं मैं  गरीबी में,
अमीरी  से  न  नाता  है  गरीबी  में  ही  पीता हूं।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
        9918140485

मानवता की चादर पे तुम धब्बे काले काले हो।मकड़े जैसे बुनकर बैठे तुम तो गंदे जाले हो।तोड़ दिए विश्वास सभी का बनकर के जेहादी तुम,दुश्मन हो जो अपने घर में गद्दारों को पाले हो।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

मानवता की  चादर  पे  तुम धब्बे काले  काले हो।
मकड़े  जैसे  बुनकर  बैठे  तुम  तो  गंदे  जाले हो।
तोड़ दिए विश्वास सभी का बनकर के जेहादी तुम,
दुश्मन  हो  जो  अपने  घर में गद्दारों  को पाले हो।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
        9918140485
         

चोरी चोरी खत लिख कर चोरी से पहुंचाना।जब न देखूं मैं तुमको तो छुपके घर में आना।सारे रिश्ते वादे तोड़े पल भर में अलविदा कहा,याद बहुत आता है तेरी गलियों में आना जाना।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 99 18140 485

चोरी चोरी  खत  लिख  कर चोरी से  पहुंचाना।
जब न  देखूं मैं  तुमको  तो छुपके घर में आना।
सारे रिश्ते वादे तोड़े पल भर में अलविदा कहा,
याद बहुत आता है तेरी गलियों में आना जाना।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
      श्री अयोध्या धाम
       99 18140 485

तुम्हें मैं प्यार करता हूं मगर मैं कह नहीं पाता।बिना सोचे मगर मैं तो कहीं भी रह नहीं पाता।कमी खलती है जीवन में बिना तेरे कहूं कैसे,मैं ओछी भावनाओं में कभी भी वह नहीं पाता।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनंत श्री अयोध्या धाम 9918140485

तुम्हें मैं प्यार करता हूं मगर मैं कह नहीं पाता।
बिना सोचे मगर मैं तो कहीं भी रह नहीं पाता।
कमी खलती  है  जीवन  में बिना तेरे कहूं कैसे,
मैं ओछी भावनाओं में कभी भी वह नहीं पाता।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनंत
       श्री अयोध्या धाम
        9918140485

भाई

भरत के जैसा  त्यागी भाई,

लखन सा  आज्ञाकारी हो।

स्नेह  राम   की   छाया  में,

रिपुसूदन सा अधिकारी हो।

और  भला  इस  जीवन में,

क्या शेष यहां पर रह जाए।

भाई भाई  में  प्रेम सदा हो,

रघुवर  सा   हितकारी   हो।

✍️ कवि अरुण द्विवेदी
              अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
       9918140485

मां की याद जब आती है तो रो लेता हूं।अपने ही आंसुओं से तन धो लेता हूं।✍️अनन्त श्री अयोध्या धाम


मां की याद जब आती है तो रो लेता हूं।
अपने ही आंसुओं से तन धो लेता हूं।
✍️अनन्त श्री अयोध्या धाम

अभी तक मैं सपनों में जी रहा था।आज मुलाकात हकीकत से हो गई।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

अभी तक मैं सपनों में जी रहा था।
आज मुलाकात हकीकत से हो गई।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
       9918140485

काट लेते हैं कुत्ते आवारा यहां।ये तो बस तेरी दुआ का असर है।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त

काट लेते हैं कुत्ते आवारा यहां।
ये तो बस तेरी दुआ का असर है।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त

अपनी नाकामियों को तुम भला कब तक छुपाओगे।इंसानियत के नाम पर हैवानियत कब तक दिखाओगे।जानवर मत समझिएगा हम भी इंसान हैं साहिब,उम्मीदों का जहर आखिर तुम कब तक पिलाओगे।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

अपनी  नाकामियों  को तुम  भला कब तक छुपाओगे।
इंसानियत के नाम पर हैवानियत कब तक दिखाओगे।
जानवर  मत   समझिएगा  हम  भी  इंसान   हैं  साहिब,
उम्मीदों का  जहर  आखिर तुम  कब  तक  पिलाओगे।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
       9918140485

शर्त जो भी थी उनकी सभी मान ली।भूल जाना हमें बात भी मान ली।प्यार से अलविदा कहके जाने लगे,अश्रु आए न आंखों में भी मान ली।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

शर्त जो भी थी उनकी सभी मान ली।
भूल  जाना  हमें  बात  भी  मान  ली।
प्यार  से अलविदा  कहके  जाने लगे,
अश्रु आए न  आंखों में  भी मान ली।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
       9918140485

हर हर बम बम का नारा ले देश बचाने आया हूं।भूल गए जो मार्ग धर्म का उन्हें दिखाने आया हूं।छोड़ो गैरों की बातें क्या उनसे लेना देना है,सोए हैं जो निद्रा में हिंदुत्व जगाने आया हूं।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

हर हर बम बम का नारा ले देश बचाने आया हूं।
भूल गए जो मार्ग धर्म का उन्हें दिखाने आया हूं।
छोड़ो  गैरों  की  बातें  क्या उनसे  लेना  देना  है,
सोए  हैं  जो  निद्रा  में  हिंदुत्व  जगाने  आया हूं।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
        9918140485

मोहब्बत में आंसू बहाने चले हैं।उसी आंसुओं में नहाने चले हैं।कभी न फिकर थी हमारी जिन्हें अब,है प्यार कितना जताने चले हैं।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

मोहब्बत  में   आंसू   बहाने   चले  हैं।
उसी   आंसुओं   में   नहाने   चले  हैं।
कभी न फिकर थी हमारी जिन्हें अब,
है   प्यार   कितना    जताने  चले  हैं।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
        श्री अयोध्या धाम
        9918140485
         

सृष्टि की आधारभूत हैं ममता की ये मूरत हैं।हर एक घरों में बनके देवी बसती इनकी सूरत है।

सृष्टि की आधारभूत हैं ममता की ये मूरत हैं।

हर एक घरों में बनके देवी बसती इनकी सूरत है।


नामर्द जाहिलों की टोली ने भगवा का अपमान किया।कुछ नमक हरामों ने मिलकर के खाकी को बदनाम किया।राम कृष्ण की धरती पर ये कैसा अत्याचार हुआ।निर्मम हत्या संतो की मानवता का संहार हुआ।नहीं सुरक्षित रहेंगे हिन्दू अगर आंख न खोलेंगे। इन गद्दारों से दुश्मन की भाषा अब हम बोलेंगे।अपमान भरा जीवन जीने से बेहतर ही मर जाना है।पर पापी नीच अधर्मी के हित परशुराम बन जाना है। ✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

नामर्द  जाहिलों  की  टोली  ने  भगवा का अपमान  किया।
कुछ नमक हरामों ने मिलकर के खाकी को बदनाम किया।
राम   कृष्ण   की   धरती   पर   ये   कैसा  अत्याचार  हुआ।
निर्मम   हत्या    संतो   की    मानवता    का   संहार   हुआ।
नहीं    सुरक्षित     रहेंगे   हिन्दू   अगर   आंख   न   खोलेंगे।
इन   गद्दारों   से   दुश्मन   की    भाषा   अब   हम   बोलेंगे।
अपमान  भरा  जीवन  जीने   से  बेहतर  ही  मर  जाना  है।
पर  पापी  नीच  अधर्मी  के  हित  परशुराम  बन  जाना  है।
          ✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
                      श्री अयोध्या धाम

                      9918140485

डूब गया हूं मैं तो तेरी झील सी गहरी आंखों में।बहक रहा हूं धीरे धीरे महकी महकी सांसों में।रूप तेरा पागल कर डाला जब से तुझको देखा है,यादों से अब निकल न पाऊं उलझा प्रेम के बालों में।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

डूब  गया  हूं  मैं  तो  तेरी  झील सी गहरी  आंखों में।
बहक  रहा  हूं   धीरे   धीरे  महकी  महकी  सांसों में।
रूप तेरा  पागल  कर  डाला जब से  तुझको देखा है,
यादों से अब निकल न पाऊं उलझा प्रेम के बालों में।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
      श्री अयोध्या धाम
      9918140485

कभी कभी छत पे चांद देख लिया करते हैं।आज फिर से वहीं इंतजार किया करते हैं।उस दुकान से मकान उसका साफ दिखता है,गली इश्क़ में जहां हम चाय पिया करते हैं।✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

कभी कभी छत  पे चांद  देख लिया करते हैं।
आज फिर  से  वहीं  इंतजार  किया करते हैं।
उस दुकान से मकान उसका साफ दिखता है,
गली  इश्क़ में  जहां  हम चाय  पिया करते हैं।
✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
     श्री अयोध्या धाम
     9918140485

तूझे चाहकर कैसे किसी की चाह करूंगा।तूझे भूलकर क्यूं खुद को तबाह करूंगा।तू जिंदगी नहीं दिल्लगी है फिर भी,क्यूं और किसी को सोच के गुनाह करूंगा।

तूझे चाहकर कैसे किसी की चाह करूंगा।
तूझे भूलकर क्यूं खुद को तबाह करूंगा।
तू जिंदगी नहीं दिल्लगी है फिर भी,
क्यूं और किसी को सोच के गुनाह करूंगा।

दर्द मीठा मुझे रोज देती रही।हर घड़ी यूं ही मुझ पे बरसती रही।।जब भी चाहा मैं दिल की दो बातें करूं।काले बादल के जैसे गरजती रही।।उसको छूते ही मुझको तो ऐसा लगा।बनके विद्युत करंट स झटकती रही।।लौटकर देर रातों से आती है जब।दारू गुटका के जैसे महकती रही।।रूप सुंदर है उसका मैं कैसे कहूं।सुर्पनखा के तो जैसे वो लगती रही।।कवांरा रखना मुझे मेरे ईश्वर सुनो।मुझको नागिन के जैसे वो डंसती रही।।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

दर्द    मीठा    मुझे    रोज   देती    रही।
हर  घड़ी  यूं  ही  मुझ  पे बरसती रही।।

जब भी चाहा मैं दिल की दो बातें करूं।
काले  बादल  के   जैसे  गरजती  रही।।

उसको  छूते ही मुझको  तो  ऐसा लगा।
बनके  विद्युत  करंट स  झटकती रही।।

लौटकर   देर  रातों  से  आती  है  जब।
दारू  गुटका  के  जैसे  महकती  रही।।

रूप  सुंदर  है   उसका   मैं  कैसे  कहूं।
सुर्पनखा  के तो  जैसे  वो लगती रही।।

कवांरा  रखना   मुझे  मेरे   ईश्वर  सुनो।
मुझको नागिन के जैसे वो डंसती रही।।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
       9918140485

पीपल तले गांव में जब हम बिन बिस्तर सो जाते हैं।

पीपल तले गांव में जब हम बिन बिस्तर सो जाते हैं।

काश मुझे भी इश्क़ हो गया होता।उन्हें पाने में रिश्क हो गया होता।तो आज हम भी मशहूर खूब होते,याद में उनके शायर हो गया होता।


काश मुझे भी इश्क़ हो गया होता।
उन्हें पाने में रिश्क हो गया होता।
तो आज हम भी मशहूर खूब होते,
याद में उनके शायर हो गया होता। 

दर्पण

काश दर्पण जो होती हमारे लिए
उम्र भर सामने तेरे बैठा रहूं।

स्वाती की प्यास में चातक मर गया।शम्मां की चाह में परवाना जल गया।।

स्वाती की प्यास में चातक मर गया।
शम्मां की चाह में परवाना जल गया।।

जाना हो तो जाओ आना हो तो आओ

जाना हो तो जाओ आना हो तो आओ।
ना जाने का गम है ना आने की खुशी।।
✍️ अरुण द्विवेदी अनन्त
      श्री अयोध्या धाम
      9918140485

तुम कहो तो दिल से क्या दुनिया से दूर चला जाऊं।पर एक वादा करो कि , तुम कभी याद नहीं करोगे।✍️ कवि अरुण द्विवेदी "अनन्त" श्री अयोध्या धाम 9918140485

तुम कहो तो दिल से क्या दुनिया से दूर चला जाऊं।
पर एक वादा करो कि , तुम कभी याद नहीं करोगे।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी "अनन्त"
           श्री अयोध्या धाम
           9918140485

करें इक दूजे का सम्मान।नहीं होगा इसमें अपमान।।यहां पर जो भी हैं इंसान।सभी हैं पल भर के मेहमान।।मगर करते हैं सभी गुमान।अब तो छोड़ो ये अभिमान।।जप लो प्यारा हरि का नाम।चाहे राधे राधे श्याम।।कहो फिर सीता सीताराम।।✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

करें इक दूजे  का  सम्मान।
नहीं  होगा  इसमें  अपमान।।

यहां  पर जो  भी  हैं इंसान।
सभी हैं पल भर के मेहमान।।

मगर  करते  हैं सभी गुमान।
अब  तो छोड़ो ये अभिमान।।

जप लो प्यारा हरि का नाम।
चाहे    राधे     राधे    श्याम।।
कहो  फिर  सीता सीताराम।।
✍️
कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
  9918140485

पढ़े लिखों की बस्ती ने ये जाहिल वाला काम किया।मां बच्चे की निर्मम हत्या करके अपना नाम किया।पापी नीच अधर्मी हो तुम इस धरती पर बोझ हो,बेजुबान ने किया भरोसा मानवता को मार दिया।

पढ़े लिखों की बस्ती ने ये जाहिल वाला काम किया।
मां बच्चे की निर्मम हत्या करके अपना नाम किया।
पापी नीच अधर्मी हो तुम इस धरती पर बोझ हो,
बेजुबान ने किया भरोसा मानवता को मार दिया।

आपको ही मैं हर पल पुकारा करूं।अपने उर में सदा ही उतारा करूं।वीर बजरंग बाबा करो अब कृपा,रामसीता युगल छवि निहारा करूं।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

आपको ही मैं हर पल पुकारा करूं।
अपने उर  में सदा  ही  उतारा करूं।
वीर  बजरंग  बाबा  करो  अब कृपा,
रामसीता  युगल छवि  निहारा करूं।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
        9918140485

किसी लीक पर आसान है चलना।तुम्हें लगता है बड़ा आसान है लिखना।

किसी लीक पर आसान है चलना।

तुम्हें लगता है बड़ा आसान है लिखना।

था नहीं जब कोई तब सहारे हुए।दिल से जीते मगर मन के हारे हुए।मेरा उनका मिलन अब सपन हो गया,इक नदी थे कभी अब किनारे हुए।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

था  नहीं  जब  कोई  तब  सहारे  हुए।
दिल  से  जीते  मगर  मन के हारे हुए।
मेरा उनका मिलन अब सपन हो गया,
इक  नदी  थे  कभी  अब किनारे हुए।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
        9918140485

यहां हैं जिस्म के चर्चे। मोहब्बत कौन करता है।।दीवाने हुस्न पे लाखों। तुझपे कौन मरता है।।तेरे जैसे अनेकों हैं। अगर ढूंढू तो मिल जाएं ,बिके बेमोल जो मुझपे। अदावत कौन करता है।।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485

यहां हैं जिस्म  के चर्चे। मोहब्बत कौन करता है।।
दीवाने हुस्न पे  लाखों। तुझपे   कौन  मरता  है।।
तेरे   जैसे   अनेकों  हैं। अगर ढूंढू तो मिल जाएं ,
बिके बेमोल जो मुझपे। अदावत कौन करता है।।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
       9918140485

है ये बहाना पर मिलने गांव आया हूं।

न थे  बुजदिल  मगर  हाय क्या हो गया।
वो  हसीं ,   चेहरे  पे  आज भी रह गया।
दिल में ऐसा था क्या खुदकुशी कर लिए,
राज  जो   भी  रहा   राज  ही  रह  गया।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
        9918140485

इस सूने दिल के  आंगन में अब इंतजार तुम्हारा है।
कहां हो ख़्वाब में आने वाले दिल मेरा अब हारा है।
मुमिकन हो यदि आ  पाना तो अंत समय ही जाना,
धूप छांव के सुख दुःख  में ये जीवन तुझपे वारा है।
✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
      श्री अयोध्या धाम
       9918140485

तुझको क्या चाहिए जिंदगी
खैर कुछ भी हो।
मैं तुझको कुछ दे नहीं सकता
मैं सब कुछ हार बैठा हूं।
यहां तक कि मैं खुद को भी
उसके नाम कर बैठा हूं।
मेरे पास अब तो
बस तन्हाई ही तन्हाई
और धुंधली सी याद बाकी है।
✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
      श्री अयोध्या धाम
      9918140485

चाइनीज  कायर को  उसकी औकात  दिखा दो मोदी जी।
हर वीर  युवा  अब  तत्पर  हैं सीमा पर भेज दो मोदी जी।।

यदि काम देश के न आएं तो इस तन का ही मतलब क्या।
कुत्तों  की  औकात  ही  कितनी युद्ध  छेड़  दो  मोदी जी।।

वीर  शहीदों   के   हैं   वंशज  मिट्टी  में  इन्हें   मिला  देंगे।
क्या सोंच के रखे हैं भारत को औकात इन्हें दिखला देंगे।।

शहीद  जवानों  के बलिदानों  का  अब  मूल्य चुकाना है।
गीदड़  भभकी  बहुत  हुई  अब  इनको  धूल  चटाना  है।।

शांति  प्रेम  की  भाषा  इनके  समझ  ना  आने  वाली है।
जिस भाषा को समझ  सके इनको समझा दो मोदी जी।।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
      श्री अयोध्या धाम
      9918140485

हर दुआ में तुझको ही मांगा करूंगा।
किस्मत में नहीं फिर भी तुझे चाहा करूंगा।
मेरी बदनसीबी तो तुझसे है क्या गिला,

दुष्ट  नपुशंक  पे करो,  ना  कभी  ऐतबार।
चाइनीज सामान का, सब करें बहिष्कार।।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
       9918140485


इश्क़ में हुआ  क्या  असर  देखिएगा।
हुस्न वालों जरा  अब इधर देखिएगा।।

हाल  ऐसा  कभी  ना  हमारा  रहा है।
चाहतों  का  अधूरा  सफर देखिएगा।।

कैसे  जीता  हूं  तन्हा  मैं  आंसू लिए।
मुझे  भी  कभी  इक नजर देखिएगा।।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
      श्री अयोध्या धाम
      9918140485

मैं इक खुली किताब हूं पढ़ सको पढ़ो।
तुम्हें  कौन  रोकता  है  गढ़ सको गढ़ो।
इल्जाम  दूसरों  का  उठाना  छोड़कर ,
दुर्गम डगर  है  फिर भी बढ़ सको बढ़ो।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
       9918140485


वंदन    अभिनंदन   करता  मैं  गीत   आपके   गाता  हूं।
थोड़ी  सी  रज  लेकर  के  मस्तक   आशीष  लगाता हूं।

हे   तात  आपके  उपकारों  से उऋण  नहीं  हो  पाऊंगा,
मैं  अदना  सा  बालक  हूं  चरणों  में  शीश  झुकाता  हूं।

अपने खुशियों की बलि देकर मुझको खूब दुलार किया।
कमी  कोई  रह  जाए  ना जीवन में  इतना  प्यार  दिया।

संघर्षों   की  भट्ठी   में   ही  तप  कर   मुझे  निखारा  है।
मेरे  सपनों  के   खातिर   ही  सारा   जीवन  वार  दिया।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
      श्री अयोध्या धाम
      9918140485

अनुराधा

*विवाह हेतु*

नाम:- कु. अनुराधा द्विवेदी

जन्म तारीख :- भाद्रपद, शुक्ल पक्ष, तिथि-अष्टिमी, दिन-बुधवार, 10/09/1997 (वास्तविक)

जन्म का समय:- रात 1 बजकर 20 मिनट

जन्म स्थान :- अयोध्या

ऊँचाई :- 5 फिट 5 इंच
मांगलिक दोष :- नही

शिक्षा: परास्नातक योग और प्राकृतिक चिकित्सा (डॉ राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय अयोध्या से अन्तिम वर्ष में अध्ययनरत)

पिताजी का नाम:- करुणाशंकर द्विवेदी (सुपरवाइजर नीलकमल प्लास्टिक कम्पनी, दादर नगर हवेली)

गोत्र:- मानस 

माताजी का नाम:- स्व. मंजू देवी

बाबा(दादा):- श्रीहरि द्विवेदी (जन स्वास्थ्य रक्षक)

चाचा:- 1- शंकरनाथ द्विवेदी
           2- कवि- जयशंकर द्विवेदी 'विश्वबंधु', एम.ए. इतिहास,कला तथा हिंदी, बी.एड्.(अध्यापक-राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, पण्डारा रोड, इण्डिया गेट, नई दिल्ली)
बहन:- रेखा द्विवेदी एम.ए., बी एड् (विवाहित-शिवशंकर‌ मिश्र उ.प्र. पुलिस)

भाई:-1- कवि अरुण द्विवेदी 'अनंत' (एम.एस.सी. कृषि)
         2- अभिषेक कुमार द्विवेदी

निवासी:- ग्राम- उत्तरपारा, ग्रामसभा- जासरपुर ( लक्ष्मणपुर ग्रांट) ,पत्रालय- भीतर गांव(चौरे बाजार), जनपद- अयोध्या

*प्रेषक:-*   
 
*कवि- जयशंकर द्विवेदी 'विश्वबंधु'*
सम्पर्क:- 9838656748

भगवाधारी बीर पुत्र हैं कमर को कसके बांधे हैं।
लेकर के हथियार हाथ में अंग अंग हम साजे हैं।।

राम कृष्ण के वंशज हैं हम तुमको धूल चटा देंगे।
मरने  को  तैयार  रहो यमलोक तुम्हें  पंहुचा देंगे।।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
      श्री अयोध्या धाम
       9918140485

छुड़ाके बुरी आदतें वो मुझसे दूर हो गए।

लिखता  हूं  श्रृंगार  मगर   अंगार  भी  लिखना  पड़ता  है ।
जब समय नहीं रुक सकता है तब हमको बढ़ना पड़ता है ।
हंसी   ठिठोली   है  जीवन  में  पर  परिवर्तन  ही  खेल  है ,
देश  हमारा  विपदा में  तब करुण भी  लिखना  पड़ता  है।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
      श्री अयोध्या धाम

(केवल आपके लिए 🌹कहानी दिल का हाल)
पूरा पढ़ लेना✍️☝️😄
जिस प्रकार प्राणी मात्र के लिए दिन रात जरूरी है, हवा पानी जरूरी है, धूप छांव जरूरी है। ठीक उसी प्रकार से जीवन में सुख दुख का मिश्रित भाव भी बहुत ही जरूरी है।
इंसान को जीवन में कभी हताश नहीं होना चाहिए। जिस प्रकार नदी निरंतर प्रवाहमान है। वायु चलायमान है। ठीक वैसे ही इंसान को अपने उन्नति के मार्ग पर सदैव अग्रसर रहना चाहिए। ना की कठिनाइयों से डरकर, हार मानकर अपने कदम को रोक लेना चाहिए। समय को अपने बस में करो, ना कि समय आपको अपने बस में करें। उससे पहले ही आपका अपना ध्येय, लक्ष्य जरूर पुकारता नजर आएगा। बस जरूरत है कि आप अपने उस दृष्टि से उसे पूर्ण करने का संकल्प लें। इंसान तो कठपुतली मात्र है, यह विचार अपने मन से हमेशा के लिए निकालकर, दूर कर दो।
इंसान की दुख की घड़ी में ही परीक्षा होती है। अब देखना यह होता है कि, आप कहां तक सफल होना चाहते हैं। लोगों की बातें सुनना छोड़ दो कि, लोग क्या कहेंगे, समाज क्या कहेगा। इन सब चिंताओं से निकलकर दूर। अपने उज्जवल भविष्य के चमकते हुए सितारे को देखो और समुद्र की भांति अटल होकर अपने सपनों को साकार करो। आप जो भी बनना चाहते हो बनो। रास्ते आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। परिवर्तन प्रकृति का नियम है।
यह सब समझा कर मेरे तन में एक नई स्फूर्ति, ऊर्जा का संचार करने वाली। इस दुनिया की भीड़ में अकेला ही छोड़कर। साथ देने का वादा करके आज मेरे दिल में होते हुए भी दूर हो। जब आप मेरे दिल में हो तो यह दूरी कैसी। छः महीने में एक बार बात करने का ये हुनर भी मुझे बहुत पसंद है, ठीक तुम्हारी तरह। आज आपकी बहुत याद आ रही थी। जीवन में कभी भी सुख की कल्पना नहीं की, आजतक। पर आज कुछ उम्मीद किरणें जगी पर, इसका भी कोई मतलब नहीं। आज एहसास हो रहा है कि, आज मैं भी कुछ और होता। जो आपका साथ मिलता। पर झूठे ख्वाब देखने का मतलब ही क्या? आप जहां भी रहो ईश्वर आपको हमेशा खुश रखें। दुख की बदली आप पर कभी ना आए। आप हमेशा हंसती रहो मुस्कुराती रहो, और हां अपना वादा भूल मत जाना।
काश आज आप यह पोस्ट पढ़कर फोन कर दो।
बस इसी आस में इंतजार करता हुआ आपका अपना
✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
     श्री अयोध्या धाम
     9918140485

नाचना खूब चाहा मुझे, अपनी अदाओं से।
मगर मेरे हौंसले ने  उसको ही नचा डाला।
अनन्त

साथ   मेरे  भला   कैसे  चल  पाओगे।
तुम बड़े  घर के  हो  कैसे ढल पाओगे।
है  जुआ  ये  दिलों  का  तो खेलेंगे हम,
दुख की बदली हूं कैसे निकल पाओगे।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
      श्री अयोध्या धाम
      9918140485

अब तक नहीं थे याद पर हैं आज आ गए।
जल के हुए जो राख तो सरताज आ गए।
मजबूरियों का वादा फिर से वादा कर गए,
उजड़ा चमन बसाने को महाराज आ गए।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन
      श्री अयोध्या धाम
             

फूल के जैसे अधरों पर भौंरा बनकर रसपान करूं।
आंखों के बीच समन्दर में यौवन का मदिरापान करूं।

आज मैं मामा बन गया

नजर लगे न भांजी को इतनी दुआ हमारी है।
बहुत बहुत बधाई घर  में नन्हीं परी पधारी है।।

लक्ष्मी स्वरूपा पुत्री रत्न प्राप्ति पर दीदी और जीजू
आपको बहुत बहुत बधाई एवं भांजी के स्वर्णिम भविष्य की हार्दिक शुभकामनाएं। हमारी उम्र भी आपको लग जाए।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
      श्री अयोध्या धाम
      9918140485

गलत कैसे करूंगा मैं
थोड़ा ईमान जिन्दा है।

बड़ा बेशर्म हूं फिर भी
थोड़ा इंसान जिन्दा है।

तुम्हारे ही लिए जाहिल
अवारा बनके फिरता हूं,

अमानत  था  रहूंगा  मैं
थोड़ा  शैतान जिन्दा है।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी
            अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
       9918140485

ऐ  जिन्दगी  तूने  रुलाया  बहुत है।
ऐ  जिन्दगी  तूने   हंसाया  बहुत है।
न कोई है शिकवा शिकायत नहीं है,
ऐ  जिन्दगी   तूने  नचाया  बहुत है।
✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
     श्री अयोध्या धाम

गलत कैसे करूंगा मैं
थोड़ा ईमान जिन्दा है।

बड़ा बेशर्म हूं फिर भी
थोड़ा इंसान जिन्दा है।

तुम्हारे ही लिए जाहिल
अवारा बनके फिरता हूं,

अमानत  था  रहूंगा  मैं
थोड़ा  शैतान जिन्दा है।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी
            अनन्त
       श्री अयोध्या धाम
       9918140485

सभी सुख मां के चरणों में मैं जब भी सर को रखता हूं।
सभी  तीरथ  ही  माता  हैं  बसा  के  दिल में  चलता हूं।
कोई  कहता  भले  ही  हो  कि  मैं  मां  के बिना  रह लूं,
मगर   माता   को   ही   मैं  तो  अनंतीश्वर  समझता  हूं

कवि अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485

उनको चाहा मगर वो जुदा हो गए।
दिल के अरमां मरे जब खुदा हो गए।
बात उनसे करें न करें क्या करें,
प्यास मेरी बुझाकर सुधा हो गए।
कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485

दुनिया की उलझनों से दूर,
काश आप हमारे साथ होते।
मिले मुझे कुछ और ना,
बस आपके हाथ में मेरे हाथ होते।
✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
     श्री अयोध्या धाम
     9918140485

पता  मुझको  है  मेरी  मौत  का पैगाम आएगा।
साथ दौलत ख़ज़ाना और  न धन धाम जाएगा।
अरुणानन्त  अवसर  खोजता  हूं  देश सेवा का,
यही सदकार्य का प्रतिफल हमारे काम आएगा।
कवि अरुण द्विवेदी "अनन्त" अयोध्या
9918140485
,

मंगलवार, 23 जून 2020

कवि अरुण द्विवेदी अनन्त

(केवल आपके लिए 🌹कहानी दिल का हाल)
पूरा पढ़ लेना✍️☝️😄
जिस प्रकार प्राणी मात्र के लिए दिन रात जरूरी है, हवा पानी जरूरी है, धूप छांव जरूरी है। ठीक उसी प्रकार से जीवन में सुख दुख का मिश्रित भाव भी बहुत ही जरूरी है।
इंसान को जीवन में कभी हताश नहीं होना चाहिए। जिस प्रकार नदी निरंतर प्रवाहमान है। वायु चलायमान है। ठीक वैसे ही इंसान को अपने उन्नति के मार्ग पर सदैव अग्रसर रहना चाहिए। ना की कठिनाइयों से डरकर, हार मानकर अपने कदम को रोक लेना चाहिए। समय को अपने बस में करो, ना कि समय आपको अपने बस में करें। उससे पहले ही आपका अपना ध्येय, लक्ष्य जरूर पुकारता नजर आएगा। बस जरूरत है कि आप अपने उस दृष्टि से उसे पूर्ण करने का संकल्प लें। इंसान तो कठपुतली मात्र है, यह विचार अपने मन से हमेशा के लिए निकालकर, दूर कर दो।
इंसान की दुख की घड़ी में ही परीक्षा होती है। अब देखना यह होता है कि, आप कहां तक सफल होना चाहते हैं। लोगों की बातें सुनना छोड़ दो कि, लोग क्या कहेंगे, समाज क्या कहेगा। इन सब चिंताओं से निकलकर दूर। अपने उज्जवल भविष्य के चमकते हुए सितारे को देखो और समुद्र की भांति अटल होकर अपने सपनों को साकार करो। आप जो भी बनना चाहते हो बनो। रास्ते आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। परिवर्तन प्रकृति का नियम है।
यह सब समझा कर मेरे तन में एक नई स्फूर्ति, ऊर्जा का संचार करने वाली। इस दुनिया की भीड़ में अकेला ही छोड़कर। साथ देने का वादा करके आज मेरे दिल में होते हुए भी दूर हो। जब आप मेरे दिल में हो तो यह दूरी कैसी। छः महीने में एक बार बात करने का ये हुनर भी मुझे बहुत पसंद है, ठीक तुम्हारी तरह। आज आपकी बहुत याद आ रही थी। जीवन में कभी भी सुख की कल्पना नहीं की, आजतक। पर आज कुछ उम्मीद किरणें जगी पर, इसका भी कोई मतलब नहीं। आज एहसास हो रहा है कि, आज मैं भी कुछ और होता। जो आपका साथ मिलता। पर झूठे ख्वाब देखने का मतलब ही क्या? आप जहां भी रहो ईश्वर आपको हमेशा खुश रखें। दुख की बदली आप पर कभी ना आए। आप हमेशा हंसती रहो मुस्कुराती रहो, और हां अपना वादा भूल मत जाना।
काश आज आप यह पोस्ट पढ़कर फोन कर दो।
बस इसी आस में इंतजार करता हुआ आपका अपना
✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
     श्री अयोध्या धाम
     9918140485

रविवार, 5 अप्रैल 2020

मारा मारा फिरता हूं

मारा  मारा  फिरता  हूं  मैं  कोई  भी अब काम नहीं।

छोटी  छोटी  बातों  से भी  मुझको अब आराम नहीं।

मेरे  ही  जज्बातों  से  दुनिया  क्यों  जाने  खेल रही ,

मेरे मुश्किल घड़ियों का लगता कोई अब शाम नहीं।

✍️ अनन्त



तुम्हें मैं प्यार करता हूं

तुम्हें मैं प्यार करता  हूं  मगर मैं कह नहीं पाता।
बिना सोंचे मगर मैं तो  कहीं  भी रह नहीं पाता।
कमी खलती है  जीवन  में  बिना  तेरे कहूं कैसे,
मैं ओछी भावनाओं में कभी भी बह नहीं पाता।
✍️ अनन्त

बेंचेते ईमान हैं

छोड़ धर्म पथ जब बेंचते ईमान हैं, ऐसे खाकी वाले क्या समाज को सुधारेंगे।
चोर बदमाश और बलात्कारी नेता आज, ऐसे लोग देश की तो छवि को बिगाड़ेंगे।
छोड़ लाज शर्म जो कि करने दलाली लगे, ऐसे तो दलाल अब देश को पछाड़ेंगे।
कभी खुद आगे जो कि बढ़ पाएं हैं नहीं, ऐसे लोग दूसरों की जड़ को उखाड़ेंगे।
✍️कवि अनन्त अयोध्या

इश्क की बीमारी

चाहे जहाँ देखा अब इश्क की बीमारी बढी़।
सभ्यता  व  संस्कृति  आपन  भुलान  हैं ।।

हाय हाय हैलो हैलो आई लव यू कहे जांय।
सोंच  गन्दी  कइके  अब  बनत सयान हैं।।

प्यार  शब्द  देखा  आज बदनाम होइ गवा।
खेल जिस्म कइ तौ  अब बढ़त दुकान हैं।।

रहीम आशा गली गली जहाँ देखा घूम रहे।
कइसेन  ई  देश  अब  बनत  महान  हैं ।।
        कवि अरुण द्विवेदी "अनन्त"
             9918140485

मेरी मौत का पैग़ाम

पता  मुझको  है  मेरी  मौत  का पैगाम आएगा।
साथ दौलत ख़ज़ाना और  न धन धाम जाएगा।
अरुणानन्त  अवसर  खोजता  हूं  देश सेवा का,
यही सदकार्य का प्रतिफल हमारे काम आएगा।
कवि अरुण द्विवेदी "अनन्त" अयोध्या
9918140485

इज्जत

पहले के जैसी इज्जत दिल में नहीं रही।
जीवन बदल लूं हिम्मत मुझमें नहीं रही।
कहते थे साथ  छोड़ेगें तेरा न हम कभी,
लगता है वो  मोहब्बत उसमें नहीं रही।
🌷✍️कवि अरुण द्विवेदी "अनन्त" (अयोध्या)
            9918140485

मौजों के समंदर में

अचानक आ गया तूफान मौजों के समंदर में।
उड़ाकर ले गया सर्वस्व अपने संग बवंडर में।
हमारे पास अब  केवल तुम्हारी याद बाकी है,
तुम्हारी मोहनी मूरत बसी है मन के मंदिर में।
कवि अरुण द्विवेदी "अनन्त"

चाहतों का गला


चाहतों का गला फिर दबाना पड़ेगा।
मुझे खुद को  ही आजमाना पड़ेगा।
न कोई हो शिकवा मोहब्बत भी न हो
मुझे खुद को फिर दफनाना पड़ेगा।
✍️ अनन्त

तुझसे नजरें

तुझसे  नजरें  मिली  की मिली रह  गयी।
उगते  सूरज के  जैसे  कली  खिल गयी।
प्यार  में   पग   मेरे   दो  जो  आगे  बढ़े,
स्वर्ग सा सुख मिला जब मुझे मिल गयी।
कवि अनन्त (अयोध्या)
9918140485

वो बात नहीं है

पहले के जैसे तुझमें वो अब बात नहीं है।
हमसे न मिली  थी  कभी तू साथ नहीं है।
चाहा था  तुझे  चाहतें  दिल में ही रह गईं,
तुम हो अमीर  पाने  की  औकात नहीं है।
अरुण द्विवेदी "अनन्त''
अयोध्या 9918140485

कसम

कसम है राम की मुझको कभी मौका हमें देना।
न तोड़े हैं न तोड़ेंगे  कभी विश्वास हम तेरा।
तुम्हें अपना बना लेंगे भला ये भूल मैं बैठा,
बने न तुम मेरे खातिर मेरी किस्मत मिटा देना।

कवि अनन्त अयोध्या
9918140485

यादों की दरिया में

मेरी यादों की दरिया  में  तू  जब  जब ख्वाब देखोगी।
नजर आऊंगा उस  पल  मैं  तू जब जब चांद देखोगी।
भला मुझसे अगर तुमको कोई यदि मिल भी जाएगा,
करोगी  इश्क़  भी  उससे   नहीं   तुम  चैन  पाओगी।

कवि अरुण द्विवेदी "अनन्त"
अयोध्या 9918140485

यादों का दिया

तेरी यादों का दिया दिल में जलता रहा।
प्यार उनसे किया फिर बिछड़ता रहा।

दीपक जलाकर

दीपक जलाकर अंधेरा मिटाओ।
गिरे राह में दीन जन को उठाओ।।

मिटाकर घृणा अपने दिल से चलो तुम।
बनकर प्रखर ज्योति जग में जलो तुम।।
करो स्नेह सबसे ये दिन न गंवाओ।
दीपक जलाकर......................1।।

जीवन मिला व्यर्थ करिए न इसको।
खिला फूल जो नष्ट करिए न इसको।।
तजो द्वेष सबको गले से लगाओ।
दीपक जलाकर....................2।।

किसी आदमी को न छोटा जताओ।
किसी भी पथिक को कभी न सताओ।।
बढ़ो खुद और सबको आगे बढ़ाओ।
दीपक जलाकर.....................3।।

कवि अरुण द्विवेदी "अनन्त (अयोध्या)
           9918140485

किधर जाऊं मैं

आपको छोड़कर के किधर जाऊं मैं।
प्रेम नजरें  घुमा  दो  निखर जाऊं मैं।
है मगर दूरी देखो तो कुछ भी नहीं,
साथ गर आपका तो संवर जाऊं मैं।
कवि अरुण द्विवेदी
 अनन्त

चांदनी रात हो

चांदनी रात हो
आपका साथ हो
✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त


तकदीर है हमारी

अब तो तुम्हारे हाथ में तकदीर है हमारी।

पर सच है दिल में  तेरे  तस्वीर है हमारी।

आ भी जाओ यारा इतना न तुम सताओ,

जीना  बगैर  मुमकिन तदवीर  है  हमारी ।

✍️ अरुण "अनन्त" (अयोध्या)

प्रेम करती मुझे

प्रेम करती मुझे प्रेम मैं भी करूं।

वो दुआ मांगती मैं सलामत रहूं।

हे प्रभु जी है तुमसे ये विनती मेरी,

वो हमारी  रहे मैं भी उसका रहूं।

✍️ कवि अनन्त (अयोध्या)
         9918140485

तुम जो हो साथ मेरे

तुम जो हो साथ मेरे तो फिर क्या मुझे,
इस जमाने से पल भर ना मतलब कोई।

तुम रहोगे सदा मेरे दिल में ही यूं,
सांस के बिन है तन का न मतलब कोई।
कवि अरुण द्विवेदी अनन्त






हमें तो आपकी केवल मधुर आवाज

हमें तो  आपकी  केवल  मधुर आवाज़ सुननी है।

दिलों में जो गलतफहमी वही तो आज कहनी है।

मिटा दो दूरियां  दिल  से  द्वेष मन में नहीं रखना,

तुम्हारी धुन में पागल हूं वही अब साज सुननी है।

✍️कवि अनन्त (अयोध्या)
       9918140485




जय मां भवानी

जय  मां भवानी  रण चंडिका कहां  हैं आप
एक   बार   मेदिनी   पे  फिर  चली  आइए।
बढ़   रही   चोरी   घूसखोरी   वा  बलात्कार
ऐसे   आताताइयों   को  आइना   दिखाईए।
काट काट पापियों की मुंडियो की माला को
पहनकर    गले     हार    सबको    बचाइए।
आज  माता भारती  की  लाज खतरे में लगे
जो   हैं   देशद्रोही   परलोक   को   पठाइए।

🙏🌷✍️कवि अनन्त (अयोध्या)
               9918140485

मैं तो कुछ भी नहीं

🌷मैं तो कुछ भी  नहीं  तू मोहब्बत मेरी।
🌷न है पहचान कुछ भी तू शोहरत मेरी।
🌷मेरे  दिल की है धड़कन तेरे  नाम की,
🌷भूल  जाना  मगर  है  तू  चाहत  मेरी।

        ✍️ कवि अरुण "अनन्त"
          🌹 9918140485🌹

प्रेम का दीप

प्रेम   का   दीप   आओ   जलाते  चलें।
हो   जहां   तम   उजाला  बनाते  चलें।।

दूरियां  न  रहे  दिल  में  दिल  से  कभी।
जो  गिरे  पथ  पे   उनको  उठाते  चलें।।

द्वेष  दुर्भाव  मन  से   मिटाकर  के  हम।
सबको   आओ   गले   से  लगाते  चलें।।

होगी चहुं ओर खुशियां ही खुशियां जहां।
रोज     ऐसी     दिवाली    मनाते   चलें।।
@कवि अरुण द्विवेदी "अनन्त"
         9918140485

       
   

आंखें

आंखें हैं  कंटीली  तो  आंखों में चुभने दो।

ये दिल है फरेबी तो इसे दिल में जलने दो।

उम्मीद किया  मैंने  वो  उम्मीद नहीं आयी,

जो प्रेम  उसे  मुझसे  उस  प्रेम में मरने दो।

कवि अरुण द्विवेदी "अनन्त"



शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

प्यार

कल तक था प्यार जिनको आज छोड़े जा रहे।
दौलत  के  वास्ते   वे  दिल  को  तोड़े  जा  रहे।
जिनके  लिए  तो  मैंने  सबको  छोड़  दिया था,
बनकर  के  बेवफ़ा  वे  दिल  को तोड़े जा रहे ।
✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त 
         श्री अयोध्या धाम
          9918140405

शनिवार, 18 जनवरी 2020

मां भवानी

जय  मां भवानी  रण चंडिका कहां  हैं आप
एक   बार   मेदिनी   पे  फिर  चली  आइए।
बढ़   रही   चोरी   घूसखोरी   वा  बलात्कार
ऐसे   आताताइयों   को  आइना   दिखाईए।
काट काट पापियों की मुंडियो की माला को
पहनकर    गले     हार    सबको    बचाइए।
आज  माता भारती  की  लाज खतरे में लगे
जो   हैं   देशद्रोही   परलोक   को   पठाइए।

🙏🌷✍️कवि अनन्त (अयोध्या)


               9918140485

मोहब्बत

🌷मैं तो कुछ भी  नहीं  तू मोहब्बत मेरी।
🌷न है पहचान कुछ भी तू शोहरत मेरी।
🌷मेरे  दिल की है धड़कन तेरे  नाम की,
🌷भूल  जाना  मगर  है  तू  चाहत  मेरी।

        ✍️ कवि अरुण "अनन्त"
          🌹 9918140485🌹