गरीबी में पला हूं मैं गरीबी में ही जीता हूं।
गरीबी सा नहीं सुख है मैं गम को रोज सीता हूं।
मेरी रब से है ये विनती जन्म लूं मैं गरीबी में,
अमीरी से न नाता है गरीबी में ही पीता हूं।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
सोमवार, 27 जुलाई 2020
गरीबी में पला हूं मैं गरीबी में ही जीता हूं।गरीबी सा नहीं सुख है मैं गम को रोज सीता हूं।मेरी रब से है ये विनती जन्म लूं मैं गरीबी में,अमीरी से न नाता है गरीबी में ही पीता हूं।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485
मानवता की चादर पे तुम धब्बे काले काले हो।मकड़े जैसे बुनकर बैठे तुम तो गंदे जाले हो।तोड़ दिए विश्वास सभी का बनकर के जेहादी तुम,दुश्मन हो जो अपने घर में गद्दारों को पाले हो।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485
मानवता की चादर पे तुम धब्बे काले काले हो।
मकड़े जैसे बुनकर बैठे तुम तो गंदे जाले हो।
तोड़ दिए विश्वास सभी का बनकर के जेहादी तुम,
दुश्मन हो जो अपने घर में गद्दारों को पाले हो।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
चोरी चोरी खत लिख कर चोरी से पहुंचाना।जब न देखूं मैं तुमको तो छुपके घर में आना।सारे रिश्ते वादे तोड़े पल भर में अलविदा कहा,याद बहुत आता है तेरी गलियों में आना जाना।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 99 18140 485
चोरी चोरी खत लिख कर चोरी से पहुंचाना।
जब न देखूं मैं तुमको तो छुपके घर में आना।
सारे रिश्ते वादे तोड़े पल भर में अलविदा कहा,
याद बहुत आता है तेरी गलियों में आना जाना।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
99 18140 485
तुम्हें मैं प्यार करता हूं मगर मैं कह नहीं पाता।बिना सोचे मगर मैं तो कहीं भी रह नहीं पाता।कमी खलती है जीवन में बिना तेरे कहूं कैसे,मैं ओछी भावनाओं में कभी भी वह नहीं पाता।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनंत श्री अयोध्या धाम 9918140485
तुम्हें मैं प्यार करता हूं मगर मैं कह नहीं पाता।
बिना सोचे मगर मैं तो कहीं भी रह नहीं पाता।
कमी खलती है जीवन में बिना तेरे कहूं कैसे,
मैं ओछी भावनाओं में कभी भी वह नहीं पाता।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनंत
श्री अयोध्या धाम
9918140485
भाई
भरत के जैसा त्यागी भाई,
लखन सा आज्ञाकारी हो।
स्नेह राम की छाया में,
रिपुसूदन सा अधिकारी हो।
और भला इस जीवन में,
क्या शेष यहां पर रह जाए।
भाई भाई में प्रेम सदा हो,
रघुवर सा हितकारी हो।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी
अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
मां की याद जब आती है तो रो लेता हूं।अपने ही आंसुओं से तन धो लेता हूं।✍️अनन्त श्री अयोध्या धाम
अभी तक मैं सपनों में जी रहा था।आज मुलाकात हकीकत से हो गई।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485
अभी तक मैं सपनों में जी रहा था।
आज मुलाकात हकीकत से हो गई।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
काट लेते हैं कुत्ते आवारा यहां।ये तो बस तेरी दुआ का असर है।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
अपनी नाकामियों को तुम भला कब तक छुपाओगे।इंसानियत के नाम पर हैवानियत कब तक दिखाओगे।जानवर मत समझिएगा हम भी इंसान हैं साहिब,उम्मीदों का जहर आखिर तुम कब तक पिलाओगे।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485
अपनी नाकामियों को तुम भला कब तक छुपाओगे।
इंसानियत के नाम पर हैवानियत कब तक दिखाओगे।
जानवर मत समझिएगा हम भी इंसान हैं साहिब,
उम्मीदों का जहर आखिर तुम कब तक पिलाओगे।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
शर्त जो भी थी उनकी सभी मान ली।भूल जाना हमें बात भी मान ली।प्यार से अलविदा कहके जाने लगे,अश्रु आए न आंखों में भी मान ली।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485
शर्त जो भी थी उनकी सभी मान ली।
भूल जाना हमें बात भी मान ली।
प्यार से अलविदा कहके जाने लगे,
अश्रु आए न आंखों में भी मान ली।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
हर हर बम बम का नारा ले देश बचाने आया हूं।भूल गए जो मार्ग धर्म का उन्हें दिखाने आया हूं।छोड़ो गैरों की बातें क्या उनसे लेना देना है,सोए हैं जो निद्रा में हिंदुत्व जगाने आया हूं।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485
हर हर बम बम का नारा ले देश बचाने आया हूं।
भूल गए जो मार्ग धर्म का उन्हें दिखाने आया हूं।
छोड़ो गैरों की बातें क्या उनसे लेना देना है,
सोए हैं जो निद्रा में हिंदुत्व जगाने आया हूं।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
मोहब्बत में आंसू बहाने चले हैं।उसी आंसुओं में नहाने चले हैं।कभी न फिकर थी हमारी जिन्हें अब,है प्यार कितना जताने चले हैं।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485
मोहब्बत में आंसू बहाने चले हैं।
उसी आंसुओं में नहाने चले हैं।
कभी न फिकर थी हमारी जिन्हें अब,
है प्यार कितना जताने चले हैं।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
सृष्टि की आधारभूत हैं ममता की ये मूरत हैं।हर एक घरों में बनके देवी बसती इनकी सूरत है।
नामर्द जाहिलों की टोली ने भगवा का अपमान किया।कुछ नमक हरामों ने मिलकर के खाकी को बदनाम किया।राम कृष्ण की धरती पर ये कैसा अत्याचार हुआ।निर्मम हत्या संतो की मानवता का संहार हुआ।नहीं सुरक्षित रहेंगे हिन्दू अगर आंख न खोलेंगे। इन गद्दारों से दुश्मन की भाषा अब हम बोलेंगे।अपमान भरा जीवन जीने से बेहतर ही मर जाना है।पर पापी नीच अधर्मी के हित परशुराम बन जाना है। ✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485
नामर्द जाहिलों की टोली ने भगवा का अपमान किया।
कुछ नमक हरामों ने मिलकर के खाकी को बदनाम किया।
राम कृष्ण की धरती पर ये कैसा अत्याचार हुआ।
निर्मम हत्या संतो की मानवता का संहार हुआ।
नहीं सुरक्षित रहेंगे हिन्दू अगर आंख न खोलेंगे।
इन गद्दारों से दुश्मन की भाषा अब हम बोलेंगे।
अपमान भरा जीवन जीने से बेहतर ही मर जाना है।
पर पापी नीच अधर्मी के हित परशुराम बन जाना है।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
डूब गया हूं मैं तो तेरी झील सी गहरी आंखों में।बहक रहा हूं धीरे धीरे महकी महकी सांसों में।रूप तेरा पागल कर डाला जब से तुझको देखा है,यादों से अब निकल न पाऊं उलझा प्रेम के बालों में।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485
डूब गया हूं मैं तो तेरी झील सी गहरी आंखों में।
बहक रहा हूं धीरे धीरे महकी महकी सांसों में।
रूप तेरा पागल कर डाला जब से तुझको देखा है,
यादों से अब निकल न पाऊं उलझा प्रेम के बालों में।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
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कभी कभी छत पे चांद देख लिया करते हैं।आज फिर से वहीं इंतजार किया करते हैं।उस दुकान से मकान उसका साफ दिखता है,गली इश्क़ में जहां हम चाय पिया करते हैं।✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485
कभी कभी छत पे चांद देख लिया करते हैं।
आज फिर से वहीं इंतजार किया करते हैं।
उस दुकान से मकान उसका साफ दिखता है,
गली इश्क़ में जहां हम चाय पिया करते हैं।
✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
तूझे चाहकर कैसे किसी की चाह करूंगा।तूझे भूलकर क्यूं खुद को तबाह करूंगा।तू जिंदगी नहीं दिल्लगी है फिर भी,क्यूं और किसी को सोच के गुनाह करूंगा।
दर्द मीठा मुझे रोज देती रही।हर घड़ी यूं ही मुझ पे बरसती रही।।जब भी चाहा मैं दिल की दो बातें करूं।काले बादल के जैसे गरजती रही।।उसको छूते ही मुझको तो ऐसा लगा।बनके विद्युत करंट स झटकती रही।।लौटकर देर रातों से आती है जब।दारू गुटका के जैसे महकती रही।।रूप सुंदर है उसका मैं कैसे कहूं।सुर्पनखा के तो जैसे वो लगती रही।।कवांरा रखना मुझे मेरे ईश्वर सुनो।मुझको नागिन के जैसे वो डंसती रही।।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485
दर्द मीठा मुझे रोज देती रही।
हर घड़ी यूं ही मुझ पे बरसती रही।।
जब भी चाहा मैं दिल की दो बातें करूं।
काले बादल के जैसे गरजती रही।।
उसको छूते ही मुझको तो ऐसा लगा।
बनके विद्युत करंट स झटकती रही।।
लौटकर देर रातों से आती है जब।
दारू गुटका के जैसे महकती रही।।
रूप सुंदर है उसका मैं कैसे कहूं।
सुर्पनखा के तो जैसे वो लगती रही।।
कवांरा रखना मुझे मेरे ईश्वर सुनो।
मुझको नागिन के जैसे वो डंसती रही।।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
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काश मुझे भी इश्क़ हो गया होता।उन्हें पाने में रिश्क हो गया होता।तो आज हम भी मशहूर खूब होते,याद में उनके शायर हो गया होता।
स्वाती की प्यास में चातक मर गया।शम्मां की चाह में परवाना जल गया।।
जाना हो तो जाओ आना हो तो आओ
तुम कहो तो दिल से क्या दुनिया से दूर चला जाऊं।पर एक वादा करो कि , तुम कभी याद नहीं करोगे।✍️ कवि अरुण द्विवेदी "अनन्त" श्री अयोध्या धाम 9918140485
तुम कहो तो दिल से क्या दुनिया से दूर चला जाऊं।
पर एक वादा करो कि , तुम कभी याद नहीं करोगे।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी "अनन्त"
श्री अयोध्या धाम
9918140485
करें इक दूजे का सम्मान।नहीं होगा इसमें अपमान।।यहां पर जो भी हैं इंसान।सभी हैं पल भर के मेहमान।।मगर करते हैं सभी गुमान।अब तो छोड़ो ये अभिमान।।जप लो प्यारा हरि का नाम।चाहे राधे राधे श्याम।।कहो फिर सीता सीताराम।।✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485
करें इक दूजे का सम्मान।
नहीं होगा इसमें अपमान।।
यहां पर जो भी हैं इंसान।
सभी हैं पल भर के मेहमान।।
मगर करते हैं सभी गुमान।
अब तो छोड़ो ये अभिमान।।
जप लो प्यारा हरि का नाम।
चाहे राधे राधे श्याम।।
कहो फिर सीता सीताराम।।
✍️
कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
पढ़े लिखों की बस्ती ने ये जाहिल वाला काम किया।मां बच्चे की निर्मम हत्या करके अपना नाम किया।पापी नीच अधर्मी हो तुम इस धरती पर बोझ हो,बेजुबान ने किया भरोसा मानवता को मार दिया।
आपको ही मैं हर पल पुकारा करूं।अपने उर में सदा ही उतारा करूं।वीर बजरंग बाबा करो अब कृपा,रामसीता युगल छवि निहारा करूं।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485
आपको ही मैं हर पल पुकारा करूं।
अपने उर में सदा ही उतारा करूं।
वीर बजरंग बाबा करो अब कृपा,
रामसीता युगल छवि निहारा करूं।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
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किसी लीक पर आसान है चलना।तुम्हें लगता है बड़ा आसान है लिखना।
था नहीं जब कोई तब सहारे हुए।दिल से जीते मगर मन के हारे हुए।मेरा उनका मिलन अब सपन हो गया,इक नदी थे कभी अब किनारे हुए।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485
था नहीं जब कोई तब सहारे हुए।
दिल से जीते मगर मन के हारे हुए।
मेरा उनका मिलन अब सपन हो गया,
इक नदी थे कभी अब किनारे हुए।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
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यहां हैं जिस्म के चर्चे। मोहब्बत कौन करता है।।दीवाने हुस्न पे लाखों। तुझपे कौन मरता है।।तेरे जैसे अनेकों हैं। अगर ढूंढू तो मिल जाएं ,बिके बेमोल जो मुझपे। अदावत कौन करता है।।✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त श्री अयोध्या धाम 9918140485
यहां हैं जिस्म के चर्चे। मोहब्बत कौन करता है।।
दीवाने हुस्न पे लाखों। तुझपे कौन मरता है।।
तेरे जैसे अनेकों हैं। अगर ढूंढू तो मिल जाएं ,
बिके बेमोल जो मुझपे। अदावत कौन करता है।।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
न थे बुजदिल मगर हाय क्या हो गया।
वो हसीं , चेहरे पे आज भी रह गया।
दिल में ऐसा था क्या खुदकुशी कर लिए,
राज जो भी रहा राज ही रह गया।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
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इस सूने दिल के आंगन में अब इंतजार तुम्हारा है।
कहां हो ख़्वाब में आने वाले दिल मेरा अब हारा है।
मुमिकन हो यदि आ पाना तो अंत समय ही जाना,
धूप छांव के सुख दुःख में ये जीवन तुझपे वारा है।
✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
तुझको क्या चाहिए जिंदगी
खैर कुछ भी हो।
मैं तुझको कुछ दे नहीं सकता
मैं सब कुछ हार बैठा हूं।
यहां तक कि मैं खुद को भी
उसके नाम कर बैठा हूं।
मेरे पास अब तो
बस तन्हाई ही तन्हाई
और धुंधली सी याद बाकी है।
✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
चाइनीज कायर को उसकी औकात दिखा दो मोदी जी।
हर वीर युवा अब तत्पर हैं सीमा पर भेज दो मोदी जी।।
यदि काम देश के न आएं तो इस तन का ही मतलब क्या।
कुत्तों की औकात ही कितनी युद्ध छेड़ दो मोदी जी।।
वीर शहीदों के हैं वंशज मिट्टी में इन्हें मिला देंगे।
क्या सोंच के रखे हैं भारत को औकात इन्हें दिखला देंगे।।
शहीद जवानों के बलिदानों का अब मूल्य चुकाना है।
गीदड़ भभकी बहुत हुई अब इनको धूल चटाना है।।
शांति प्रेम की भाषा इनके समझ ना आने वाली है।
जिस भाषा को समझ सके इनको समझा दो मोदी जी।।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
दुष्ट नपुशंक पे करो, ना कभी ऐतबार।
चाइनीज सामान का, सब करें बहिष्कार।।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
इश्क़ में हुआ क्या असर देखिएगा।
हुस्न वालों जरा अब इधर देखिएगा।।
हाल ऐसा कभी ना हमारा रहा है।
चाहतों का अधूरा सफर देखिएगा।।
कैसे जीता हूं तन्हा मैं आंसू लिए।
मुझे भी कभी इक नजर देखिएगा।।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
मैं इक खुली किताब हूं पढ़ सको पढ़ो।
तुम्हें कौन रोकता है गढ़ सको गढ़ो।
इल्जाम दूसरों का उठाना छोड़कर ,
दुर्गम डगर है फिर भी बढ़ सको बढ़ो।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
वंदन अभिनंदन करता मैं गीत आपके गाता हूं।
थोड़ी सी रज लेकर के मस्तक आशीष लगाता हूं।
हे तात आपके उपकारों से उऋण नहीं हो पाऊंगा,
मैं अदना सा बालक हूं चरणों में शीश झुकाता हूं।
अपने खुशियों की बलि देकर मुझको खूब दुलार किया।
कमी कोई रह जाए ना जीवन में इतना प्यार दिया।
संघर्षों की भट्ठी में ही तप कर मुझे निखारा है।
मेरे सपनों के खातिर ही सारा जीवन वार दिया।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
अनुराधा
*विवाह हेतु*
नाम:- कु. अनुराधा द्विवेदी
जन्म तारीख :- भाद्रपद, शुक्ल पक्ष, तिथि-अष्टिमी, दिन-बुधवार, 10/09/1997 (वास्तविक)
जन्म का समय:- रात 1 बजकर 20 मिनट
जन्म स्थान :- अयोध्या
ऊँचाई :- 5 फिट 5 इंच
मांगलिक दोष :- नही
शिक्षा: परास्नातक योग और प्राकृतिक चिकित्सा (डॉ राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय अयोध्या से अन्तिम वर्ष में अध्ययनरत)
पिताजी का नाम:- करुणाशंकर द्विवेदी (सुपरवाइजर नीलकमल प्लास्टिक कम्पनी, दादर नगर हवेली)
गोत्र:- मानस
माताजी का नाम:- स्व. मंजू देवी
बाबा(दादा):- श्रीहरि द्विवेदी (जन स्वास्थ्य रक्षक)
चाचा:- 1- शंकरनाथ द्विवेदी
2- कवि- जयशंकर द्विवेदी 'विश्वबंधु', एम.ए. इतिहास,कला तथा हिंदी, बी.एड्.(अध्यापक-राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, पण्डारा रोड, इण्डिया गेट, नई दिल्ली)
बहन:- रेखा द्विवेदी एम.ए., बी एड् (विवाहित-शिवशंकर मिश्र उ.प्र. पुलिस)
भाई:-1- कवि अरुण द्विवेदी 'अनंत' (एम.एस.सी. कृषि)
2- अभिषेक कुमार द्विवेदी
निवासी:- ग्राम- उत्तरपारा, ग्रामसभा- जासरपुर ( लक्ष्मणपुर ग्रांट) ,पत्रालय- भीतर गांव(चौरे बाजार), जनपद- अयोध्या
*प्रेषक:-*
*कवि- जयशंकर द्विवेदी 'विश्वबंधु'*
सम्पर्क:- 9838656748
भगवाधारी बीर पुत्र हैं कमर को कसके बांधे हैं।
लेकर के हथियार हाथ में अंग अंग हम साजे हैं।।
राम कृष्ण के वंशज हैं हम तुमको धूल चटा देंगे।
मरने को तैयार रहो यमलोक तुम्हें पंहुचा देंगे।।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
(केवल आपके लिए 🌹कहानी दिल का हाल)
पूरा पढ़ लेना✍️☝️😄
जिस प्रकार प्राणी मात्र के लिए दिन रात जरूरी है, हवा पानी जरूरी है, धूप छांव जरूरी है। ठीक उसी प्रकार से जीवन में सुख दुख का मिश्रित भाव भी बहुत ही जरूरी है।
इंसान को जीवन में कभी हताश नहीं होना चाहिए। जिस प्रकार नदी निरंतर प्रवाहमान है। वायु चलायमान है। ठीक वैसे ही इंसान को अपने उन्नति के मार्ग पर सदैव अग्रसर रहना चाहिए। ना की कठिनाइयों से डरकर, हार मानकर अपने कदम को रोक लेना चाहिए। समय को अपने बस में करो, ना कि समय आपको अपने बस में करें। उससे पहले ही आपका अपना ध्येय, लक्ष्य जरूर पुकारता नजर आएगा। बस जरूरत है कि आप अपने उस दृष्टि से उसे पूर्ण करने का संकल्प लें। इंसान तो कठपुतली मात्र है, यह विचार अपने मन से हमेशा के लिए निकालकर, दूर कर दो।
इंसान की दुख की घड़ी में ही परीक्षा होती है। अब देखना यह होता है कि, आप कहां तक सफल होना चाहते हैं। लोगों की बातें सुनना छोड़ दो कि, लोग क्या कहेंगे, समाज क्या कहेगा। इन सब चिंताओं से निकलकर दूर। अपने उज्जवल भविष्य के चमकते हुए सितारे को देखो और समुद्र की भांति अटल होकर अपने सपनों को साकार करो। आप जो भी बनना चाहते हो बनो। रास्ते आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। परिवर्तन प्रकृति का नियम है।
यह सब समझा कर मेरे तन में एक नई स्फूर्ति, ऊर्जा का संचार करने वाली। इस दुनिया की भीड़ में अकेला ही छोड़कर। साथ देने का वादा करके आज मेरे दिल में होते हुए भी दूर हो। जब आप मेरे दिल में हो तो यह दूरी कैसी। छः महीने में एक बार बात करने का ये हुनर भी मुझे बहुत पसंद है, ठीक तुम्हारी तरह। आज आपकी बहुत याद आ रही थी। जीवन में कभी भी सुख की कल्पना नहीं की, आजतक। पर आज कुछ उम्मीद किरणें जगी पर, इसका भी कोई मतलब नहीं। आज एहसास हो रहा है कि, आज मैं भी कुछ और होता। जो आपका साथ मिलता। पर झूठे ख्वाब देखने का मतलब ही क्या? आप जहां भी रहो ईश्वर आपको हमेशा खुश रखें। दुख की बदली आप पर कभी ना आए। आप हमेशा हंसती रहो मुस्कुराती रहो, और हां अपना वादा भूल मत जाना।
काश आज आप यह पोस्ट पढ़कर फोन कर दो।
बस इसी आस में इंतजार करता हुआ आपका अपना
✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
साथ मेरे भला कैसे चल पाओगे।
तुम बड़े घर के हो कैसे ढल पाओगे।
है जुआ ये दिलों का तो खेलेंगे हम,
दुख की बदली हूं कैसे निकल पाओगे।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
आज मैं मामा बन गया
नजर लगे न भांजी को इतनी दुआ हमारी है।
बहुत बहुत बधाई घर में नन्हीं परी पधारी है।।
लक्ष्मी स्वरूपा पुत्री रत्न प्राप्ति पर दीदी और जीजू
आपको बहुत बहुत बधाई एवं भांजी के स्वर्णिम भविष्य की हार्दिक शुभकामनाएं। हमारी उम्र भी आपको लग जाए।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
गलत कैसे करूंगा मैं
थोड़ा ईमान जिन्दा है।
बड़ा बेशर्म हूं फिर भी
थोड़ा इंसान जिन्दा है।
तुम्हारे ही लिए जाहिल
अवारा बनके फिरता हूं,
अमानत था रहूंगा मैं
थोड़ा शैतान जिन्दा है।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी
अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
गलत कैसे करूंगा मैं
थोड़ा ईमान जिन्दा है।
बड़ा बेशर्म हूं फिर भी
थोड़ा इंसान जिन्दा है।
तुम्हारे ही लिए जाहिल
अवारा बनके फिरता हूं,
अमानत था रहूंगा मैं
थोड़ा शैतान जिन्दा है।
✍️ कवि अरुण द्विवेदी
अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
सभी सुख मां के चरणों में मैं जब भी सर को रखता हूं।
सभी तीरथ ही माता हैं बसा के दिल में चलता हूं।
कोई कहता भले ही हो कि मैं मां के बिना रह लूं,
मगर माता को ही मैं तो अनंतीश्वर समझता हूं।
कवि अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
दुनिया की उलझनों से दूर,
काश आप हमारे साथ होते।
मिले मुझे कुछ और ना,
बस आपके हाथ में मेरे हाथ होते।
✍️कवि अरुण द्विवेदी अनन्त
श्री अयोध्या धाम
9918140485
पता मुझको है मेरी मौत का पैगाम आएगा।
साथ दौलत ख़ज़ाना और न धन धाम जाएगा।
अरुणानन्त अवसर खोजता हूं देश सेवा का,
यही सदकार्य का प्रतिफल हमारे काम आएगा।
कवि अरुण द्विवेदी "अनन्त" अयोध्या
9918140485
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